
चार पीढ़ियाँ एक मंच पर: साहित्य और लोकसंस्कृति से सजा चित्तौड़गढ़ उत्सव का द्वितीय दिवस
Vandebharat live tv news, network udaipur
चीत्तौड़गढ़ साहित्य उत्सव–2026

द्वितीय दिवस पर साहित्य, लोककला और संवाद का अद्भुत संगम
चित्तौड़गढ़, 26 फरवरी 2026।
21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन की श्रृंखला में आयोजित चित्तौड़गढ़ साहित्य उत्सव–2026 के द्वितीय दिवस पर साहित्य, भाषा, लोकसंस्कृति और वैचारिक संवाद के विविध आयाम देखने को मिले। दिनभर चले सत्रों में पुस्तक लोकार्पण, लेखक संवाद, अंग्रेज़ी और उर्दू विमर्श, डिजिटल युग की चुनौतियों पर चर्चा तथा लोककलाओं की मनोहारी प्रस्तुतियाँ आकर्षण का केंद्र रहीं।
गरिमामय उद्घाटन सत्र
द्वितीय दिवस का शुभारंभ प्रातः आयोजित उद्घाटन सत्र से हुआ। मंच पर पद्मश्री उर्मिला श्रीवास्तव, पद्मश्री मुन्ना मास्टर, पद्मश्री सी.पी. देवल, पूर्व पुलिस महानिदेशक डॉ. आनन्दवर्धन शुक्ल तथा वरिष्ठ व्यंग्यकार फारूक आफरीदी एवं 21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन के संस्थापक एवं प्रवर्तक अनिल सक्सेना ‘ललकार’ मंचासीन रहे।
अतिथियों ने अपने उद्बोधनों में साहित्य को समाज की नैतिक चेतना का आधार बताते हुए भारतीय भाषाओं, लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
‘मुट्ठी भर उजास’ का लोकार्पण
दिवस की प्रमुख शुरुआत आरती शर्मा उदयपुर की पुस्तक ‘मुट्ठी भर उजास’ के लोकार्पण से हुई। इस अवसर पर साहित्य प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
कार्यक्रम के दौरान राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर के तत्वावधान में बूंदा खान और उनकी पार्टी द्वारा लोक गायन की सुमधुर प्रस्तुति दी गई, जिसने सभागार को राजस्थानी लोकधुनों से सराबोर कर दिया।
‘लेखक की बात’ सत्र में वरिष्ठ लेखक विनोद भारद्वाज से डॉ. राखी सिंह ने संवाद किया। वार्ता के दौरान रचना प्रक्रिया, समकालीन साहित्यिक प्रवृत्तियों और लेखक की सामाजिक जिम्मेदारी पर गंभीर चर्चा हुई।
पुस्तक ‘मधुमास लाऊंगी मैं’ की लेखिका डॉ. शकुंतला सरूपरिया से माणक सोनी ने विस्तृत चर्चा की। सत्र में काव्य संवेदना, नारी अभिव्यक्ति और जीवन के सौंदर्यबोध पर विचार व्यक्त किए गए।
गुरु–शिष्य की चार पीढ़ियाँ एक मंच पर
दिवस का विशेष आकर्षण अंग्रेज़ी सत्र रहा, जिसमें गुरु–शिष्य परंपरा की चार पीढ़ियाँ एक साथ मंच पर उपस्थित रहीं।
डॉ. पारितोष दुग्गल, डॉ. के.एस. कंग, डॉ. अनन्त दाधीच, शांति सक्सेना और भावना ने अंग्रेज़ी साहित्य के विविध आयामों पर विचार रखे। उल्लेखनीय रहा कि डॉ. परितोष दुग्गल के शिष्य डॉ. कंग, डॉ. कंग के शिष्य डॉ. अनन्त दाधीच और डॉ. अनन्त की शिष्या भावना चारों एक मंच पर उपस्थित रहे। इस क्रम ने भारतीय गुरु–शिष्य परंपरा की निरंतरता का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया।
अंग्रेज़ी विमर्श के पश्चात उर्दू सत्र में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ मुस्ताक सदफ(अलीगढ़), लोकेश कुमार सिंह साहिल (जयपुर), श्री आलोक अविरल (नोयडा), डॉ गुलजीदां खान , सीकर और डॉ अवधेश जौहरी (भीलवाड़ा) की मौजूदगी में आयोजित हुआ, जिसमें उर्दू भाषा, साहित्य और उसकी सांस्कृतिक विरासत पर वक्ताओं ने विचार रखे। भाषा की गंगा-जमुनी परंपरा और साझा सांस्कृतिक धरोहर पर विशेष जोर दिया गया।
“डिजिटल डिटॉक्स : तकनीक का संतुलित उपयोग” विषय पर आयोजित सत्र में डॉ गौतम कुकड़ा, श्री परेश नागर, डॉ रोहित सेन, सुभाष पारीक और चेतन आनंद (गाजियाबाद) ने आधुनिक तकनीक के बढ़ते प्रभाव, सोशल मीडिया निर्भरता और मानसिक संतुलन पर उसके प्रभावों पर चर्चा की। वक्ताओं ने तकनीक के सकारात्मक उपयोग के साथ संयम की आवश्यकता पर बल दिया।
लोककला की रंगारंग प्रस्तुतियाँ
इसके बाद लोक कला मंडल, उदयपुर द्वारा आकर्षक कठपुतली शो प्रस्तुत किया गया, जिसने दर्शकों को लोकनाट्य की जीवंत परंपरा से परिचित कराया।
सांध्य सत्र में भारतीय लोक कला मंडल द्वारा ‘पन्नाधाय’ पर आधारित नाट्य मंचन किया गया। ऐतिहासिक बलिदान की इस प्रस्तुति ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया।
इसके पश्चात भवाई नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति ने राजस्थानी लोकसंस्कृति की जीवंतता को साकार कर दिया।
द्वितीय दिवस ने यह सिद्ध किया कि चित्तौड़गढ़ साहित्य उत्सव केवल साहित्यिक आयोजन नहीं, बल्कि भाषा, विचार और लोकपरंपराओं का जीवंत उत्सव है, जहाँ संवाद और संस्कृति साथ-साथ चलते हैं। उत्सव के माध्यम से साहित्य और समाज के बीच सार्थक संवाद की परंपरा को सुदृढ़ करने का प्रयास निरंतर जारी है।






